चाहता हूँ मैं कि इक जलता दिया रह जाए

दर्द ये घाव मिरा ज़ख़्म हरा रह जाए

बद-दुआ है ये मुहब्बत हो किसी से तुझ को
रूह ले जाए वो बस जिस्म तिरा रह जाए

रात को पीने से तो सुब्ह उतर जाती है
जाम ऐसा दे कि ता-उम्र नशा रह जाए

आदमी भी तो कोई सच्चा नहीं रहता है
कैसे फिर फूल हमेशा ही खिला रह जाए

घोलते रहते हो तुम ज़हर हवा में अक्सर
और फिर चाहते हो दोस्त फ़ज़ा रह जाए

— Rovej sheikh

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