हाथ जब आए ज़िन्दगी के अश्क़
ग़ैर लगने लगे ख़ुदी के अश्क़
अश्क़ भी मेरे बे-वफ़ा निकले
पाया इन हाथों में उसी के अश्क़
रो नहीं पाता आदमी लेकिन
ख़ूब रोते हैं आदमी के अश्क़
चार कंधों पे भारी पड़ते हैं
अपनी माँ की रवानगी के अश्क़
कौन गंदा करेगा हाथ अपने
कौन पोंछेगा मुफ़्लिसी के अश्क़
कोई आकर जी भर रो सकता है
लेते हैं हम बहुत किसी के अश्क़
आँखों में अश्क़ आ गए मेरे
याद जो आए आशिक़ी के अश्क़
अब समय किसके पास है ग़म का
अब रुलाते हैं बस ख़ुशी के अश्क़
राब्ता भी तभी सही है ‘किंशु’
बहते हों जब बराबरी के अश्क़
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