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उदासी हर तरफ़ छाने लगी है - Krishnakant Kabk

उदासी हर तरफ़ छाने लगी है
मुझे तू याद फिर आने लगी है

अभी तो होश में आ ही रहा था
हवा फिर मुझको बहलाने लगी है

कहा है नासमझ मुझको ही उसने
मुझे ही फिर वो समझाने लगी है

तरीक़ा और नहीं सूझा कोई तो
मेरी झूठी कसम खाने लगी है

गई वो तो लगा, परछाई मेरी
मुझे ही छोड़ कर जाने लगी है

- Krishnakant Kabk

Udasi Shayari

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