अपने हिस्से का अगर बादल भी पाता
इश्क़ का पौधा हमारा पल भी पाता
रोज़ ख़्वाबों में मुझे दिखता तेरा घर
काश नींदों में कभी मैं चल भी पाता
आज पाई है मोहब्बत जितनी मैं ने
काश मैं उतनी मोहब्बत कल भी पाता
जल रहा हूँ रोज़ सूरज की तरह मैं
काश थोड़ी देर को मैं ढल भी पाता
बीज बो कर प्यार का क्यूँ हार मानी
सब्र करता तू अगर तो फल भी पाता
— Krishnakant Kabk















