yaanii ki 'ishq apna mukammal nahin hua | यानी कि 'इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ

  - Kushal Dauneria

यानी कि 'इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ
गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ

वो शख़्स सालों बाद भी कितना हसीन है
वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ

उस गोद जैसी नींद मुयस्सर न हो सकी
उतना तो मखमली कभी मखमल नहीं हुआ

दो चार राब्तों ने ही पागल किया मुझे
अच्छा हुआ जो रब्त मुसलसल नहीं हुआ

इस बार मेरे हाल पे खुलकर नहीं हँसी
इस बार तेरे गाल पे डिंपल नहीं हुआ

अंधा वो क्यूँ हुआ पता लगने के बाद मैं
ता-उम्र उसकी आँख से ओझल नहीं हुआ

यूँँ खींचती है तीर वो अपने निशाने पर
हर इक शिकार मर गया घायल नहीं हुआ

  - Kushal Dauneria

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