शब-ए-फ़िराक़ ये लौ बढ़ गई चराग़ों मेंचमक उठे थे मिरे आँसू भी अँधेरों मेंमैं इस लिए कभी इज़हार कर नहीं पायामुझे फ़रेब नज़र आता था हसीनों में— Harsh Kumar Bhatnagar