karb chehron pe sajaate hue mar jaate hain | कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

  - Malikzada Javed

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं
हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं
लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मुयस्सर नहीं होती मंज़िल
ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से
इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह
जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे
वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'
हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

  - Malikzada Javed

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