हूँ मुश्त-ए-ख़ाक तू उपकार कर देहक़ीक़त का मुझे हक़दार कर देशिकायत-गर भी करते हैं तशक्कुरतू जिस की ज़िंदगी हमवार कर दे— Manish Pithaya