नहीं हम तुम समझते ख़ामुशी के ग़म
तभी तो बढ़ रहे हैं हर किसी के ग़म
नहीं आता किसी के काम कोई अब
यही तो हैं मियाँ बस ज़िंदगी के ग़म
जिसे पाने कि ख़ातिर ज़िंदगी खो दी
मुझे अब तक सताते हैं उसी के ग़म
यहाँ कोई न कोई रोज़ मरता है
कभी होते नहीं कम ख़ुद-कुशी के ग़म
मोहब्बत ही मियाँ इक दुख नहीं है बस
हज़ारों हैं यहाँ पर आदमी के ग़म
— Manish watan















