"महँगाई"
आह न कोई गूँज नज़र आती हैं
ये लोगों पर ख़ूब सितम ढाती हैं
ये ख़ामोशी से हमला करती हैं
जनता इस के बोझ तले मरती हैं
यदि तुम इस की चाल नहीं समझोगे
एक न इक दिन बीच नदी डूबोगे
मजबूरी का लाभ उठाती हैं ये
इंसानों को ख़ूब सताती हैं ये
पहले दुख का क़िस्सा बन जाती हैं
फिर जीवन का हिस्सा बन जाती हैं
कविता कह कर बात हैं ये समझाई
यारों इस को कहते हैं महँगाई
— Manohar Shimpi















