"चिंगारी"
आज़ादी के ख़्वाब उन के कैसे रँगते रहे
ख़्वाबों में सैलाब जैसे फिर उमड़ते रहे
भगत सिंह संग राजगुरु और सुखदेव
मुल्क के लिए मिल के ख़ूब लड़ते रहे
धागे से धागे ही इस क़दर जुड़ते गए
काफ़िले में लोग बहुत सारे बढ़ते रहे
एसेंबली में एक छोटी चिंगारी से जैसे
माहौल और मौसम के रंग बदलते रहे
नारा इंक़िलाब जिंदाबाद देते देते ही
फाँसी का फिर तख़्ता वो ही चढ़ते रहे
ख़्वाब ये तो देखे नहीं थे उन्होंने भी
आज़ादी में छींटे ख़ून के कहीं उड़ते रहे
मिल के सभी याद करों क़ुर्बानी उन की
मुल्क के वास्ते हो सके अच्छा करते रहे
— Manohar Shimpi















