ham ne jaana tha sukhun honge zabaan par kitne | हम ने जाना था सुख़न होंगे ज़बाँ पर कितने

  - Meer Taqi Meer

हम ने जाना था सुख़न होंगे ज़बाँ पर कितने
पर क़लम हाथ जो आई लिखे दफ़्तर कितने

मैं ने इस उस सन्नाअ से सर खींचा है
कि हर इक कूचे में जिस के थे हुनर-वर कितने

किश्वर-ए-इश्क़ को आबाद न देखा हम ने
हर गली-कूचे में ऊजड़ पड़े थे घर कितने

आह निकली है ये किस की हवस सैर-ए-बहार
आते हैं बाग़ में आवारा हुए पर कितने

देखियो पंजा-ए-मिज़्गाँ की टक आतिश-दस्ती
हर सहर ख़ाक में मिलते हैं दर-ए-तर कितने

कब तलक ये दिल सद-पारा नज़र में रखिए
उस पर आँखें ही सिए रहते हैं दिलबर कितने

'उम्र गुज़री कि नहीं दो आदम से कोई
जिस तरफ़ देखिए अर्से में हैं अब ख़र कितने

तू है बेचारा गदा 'मीर' तिरा किया मज़कूर
मिल गए ख़ाक में याँ साहब अफ़सर कितने

  - Meer Taqi Meer

Insaan Shayari

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