कहना तिरे मुँह पर तो निपट बे-अदबी है

ज़ाहिद जो सिफ़त तुझ में है सोज़न-ए-जलबी है

इस दश्त में ऐ सैल सँभल ही के क़दम रख
हर सम्त को याँ दफ़्न मरी तिश्ना-लबी है

हर इक से कहा नींद में पर कोई न समझा
शायद कि मिरे हाल का क़िस्सा अरबी है

उज़्लत से निकल शैख़ कि तेरे लिए तयार
कोई हफ़्त-गज़ी मेख़ कोई दह-वजबी है

ऐ चर्ख़ न तू रोज़-ए-सियह 'मीर' पे लाना
बेचारा वो इक नारा-ज़न नीम-शबी है

— Meer Taqi Meer

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Neend Shayari

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