yaad us ki itni khoob nahin meer baaz aa | याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ

  - Meer Taqi Meer

याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा

  - Meer Taqi Meer

Promise Shayari

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    इस तरह रोते हैं हम याद तुझे करते हुए
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    क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया
    कभी उस राह से निकला तो तुझे घूर गया

    ले गया सुब्ह के नज़दीक मुझे ख़्वाब ऐ वाए
    आँख उस वक़्त खुली क़ाफ़िला जब दूर गया

    गोर से नाले नहीं उठते तो नय उगती है
    जी गया पर न हमारा सर पुर-शोर गया

    चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से कल रात लहू फिर टपका
    हम ने जाना था कि बस अब तो ये नासूर गया

    ना-तवाँ हम हैं कि हैं ख़ाक गली की उस की
    अब तो बे-ताक़ती से दिल का भी मक़्दूर गया

    ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह
    शम्अ' के चहरा-ए-रख्शां से तो अब नूर गया

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    क्या तिरे कूचे से ऐ शोख़ वो रंजूर गया
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    Meer Taqi Meer
    रोते फिरते हैं सारी सारी रात
    अब यही रोज़गार है अपना
    Meer Taqi Meer
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    रात गुज़रे है मुझे नज़्अ' में रोते रोते
    आँखें फिर जाएँगी अब सुब्ह के होते होते

    खोल कर आँख उड़ा दीद जहाँ का ग़ाफ़िल
    ख़्वाब हो जाएगा फिर जागना सोते सोते

    दाग़ उगते रहे दिल में मिरी नौमीदी से
    हारा में तुख़्म तमन्ना को भी बूते बूते

    जी चला था कि तिरे होंट मुझे याद आए
    ला'ल पाएँ हैं मैं इस जी ही के खोते खोते

    जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तरह 'मीर' ज़ि-बस
    उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते
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    Meer Taqi Meer
    दिल पहुँचा हलाकी को निपट खींच कसाला
    ले यार मिरे सल्लमहू अल्लाह-तआला

    कुछ मैं नहीं उस दिल की परेशानी का बाइ'स
    बरहम ही मिरे हाथ लगा था ये रिसाला

    मा'मूर शराबों से कबाबों से है सब दैर
    मस्जिद में है क्या शैख़ पियाला न निवाला

    गुज़रे है लहू वाँ सर हर ख़ार से अब तक
    जिस दश्त में फूटा है मिरे पाँव का छाला

    गर क़स्द उधर का है तो टक देख के आना
    ये देर है ज़हाद न हो ख़ाना-ए-ख़ाला

    जिस घर में तिरे जल्वे से हो चाँदनी का फ़र्श
    वाँ चादर महताब है मकड़ी का सा जाला

    दुश्मन न कुदूरत से मिरे सामने हो जो
    तलवार के लड़ने को मिरे कीजो हवाला

    नामूस मुझे साफ़ी तीनत की है वर्ना
    रुस्तम ने मिरी तेग़ का हमला न सँभाला

    देखे है मुझे दीदा-ए-पुर-ख़श्म से वो 'मीर'
    मेरे ही नसीबों में था ये ज़हर का प्याला
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    Meer Taqi Meer
    क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
    आँखें तो कहीं थीं दिल-ए-ग़म-दीदा कहीं था

    किस रात नज़र की है सोई चश्मक-ए-अंजुम
    आँखों के तले अपने तो वो माह-जबीं था

    आया तो सही वो कोई दम के लिए लेकिन
    होंटों पे मिरे जब नफ़स बाज़-पसीं था

    अब कोफ़्त से हिज्राँ की जहाँ तन पे रखा हाथ
    जो दर्द-ओ-अलम था सो कहे तू कि वहीं था

    जाना नहीं कुछ जुज़ ग़ज़ल आ कर के जहाँ में
    कल मेरे तसर्रुफ़ में यही क़िता-ए-ज़मीं था

    नाम आज कोई याँ नहीं लेता है उन्हों का
    जिन लोगों के कल मुल्क ये सब ज़ेर-ए-नगीं था

    मस्जिद में इमाम आज हुआ आ के वहाँ से
    कल तक तो यही 'मीर' ख़राबात-नशीं था
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