मेरे तसव्वुर से निकल जाता है क्यूँ
वो शाम से पहले ही ढल जाता है क्यूँ
जो आग गुज़री भी नहीं छू कर कभी
उस आग से ये जिस्म जल जाता है क्यूँ
है टूटना अंकुर मुक़द्दर गर मिरा
ये आइना साँचे में ढल जाता है क्यूँ
— Ankur Mishra
वो शाम से पहले ही ढल जाता है क्यूँ
जो आग गुज़री भी नहीं छू कर कभी
उस आग से ये जिस्म जल जाता है क्यूँ
है टूटना अंकुर मुक़द्दर गर मिरा
ये आइना साँचे में ढल जाता है क्यूँ
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling