जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे
तब मैं ने अपने दिल में लाखों ख़याल बाँधे
दो दिन में हम तो रीझे ऐ वाए हाल उन का
गुज़रे हैं जिन के दिल को याँ माह-ओ-साल बाँधे
तार-ए-निगह में उस के क्यूँँकर फँसे न ये दिल
आँखों ने जिस के लाखों वहशी ग़ज़ाल बाँधे
जो कुछ है रंग उस का सो है नज़र में अपनी
गो जामा ज़र्द पहने या चीरा लाल बाँधे
तेरे ही सामने कुछ बहके है मेरा नाला
वर्ना निशाने हम ने मारे हैं बाल बाँधे
बोसे की तो है ख़्वाहिश पर कहिए क्यूँँकि उस से
जिस का मिज़ाज लब पर हर्फ़-ए-सवाल बाँधे
मारोगे किस को जी से किस पर कमर कसी है
फिरते हो क्यूँँ प्यारे तलवार ढाल बाँधे
दो-चार शे'र आगे उस के पढ़े तो बोला
मज़मूँ ये तू ने अपने क्या हस्ब-ए-हाल बाँधे
'सौदा' जो उन ने बाँधा ज़ुल्फ़ों में दिल सज़ा है
शे'रों में उस के तू ने क्यूँँ ख़त्त-ओ-ख़ाल बाँधे
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Mohammad Rafi Sauda
our suggestion based on Mohammad Rafi Sauda
As you were reading I Miss you Shayari Shayari