"काग़ज़ की नाव "

डाइरी के उस मुड़े हुए काग़ज़ पर
पक्के रंग की एक स्केच से
कुछ लिखा हुआ था
जब खोला पूरा पन्ना
तो नाम तुम्हारा पाया
मतलब
नाम तुम्हारा लिखा हुआ था
पर जब तक मैं पीछे जाता
यादों की पोटली टटोलता
तब मैं ने बारिश से सीखा
यूँ होता तो कैसा होता
पहली बारिश में कुछ बच्चे झूम रहे थे
मेंढक लंबे इंतिज़ार के बा'द कैसे कूद रहे थे
एक बच्चे ने बारिश में
कुछ जोश दिखाया
और अपने नन्हे हाथों से
मेज पर रखी डाइरी से
वो पन्ना उड़ाया
फिर उस ने उस काग़ज़ की नाव बनाई
मेरी तरह अपनी ख़्वाहिश नहीं छिपाई
अब वो नाम तुम्हारा
बारिश के पानी में
गुड-गुड गोते खाता है
जैसे नाव पे बैठ के मुझ को
कोई ये समझाता है
क्यूँ अब तक इंतिज़ार करते हो
क्यूँ पहली बारिश से डरते हो
काश कि ख़्वाहिश को न छिपाते
तुम भी जगह नाव पर पाते

— Muntazir Firozabadi

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