वो क़ज़ा के रंज में जान दें कि नमाज़ जिन की क़ज़ा हुई
तिरे मस्त-ए-बादा-ए-शौक़ ने न कभी पढ़ी न अदा हुई
तिरे दौर-दौरा-ए-इश्क़ में मिरी एक रंग से कट गई
न सितम हुआ न करम हुआ न जफ़ा हुई न वफ़ा हुई
मुझे ग़ैर-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़ ने तिरे दर पे जा के झुका दिया
न तो कोई अहद लिखा गया न तो कोई रस्म अदा हुई
मिरा दिल भी था मिरी जाँ भी थी न वही रहा न यही रही
मुझे क्या ख़बर कि वो क्या हुआ मुझे क्या ख़बर कि ये क्या हुई
मिरी 'उम्र 'मुज़्तर'-ए-ख़स्ता-दिल कटी रंज-ओ-दर्द-ओ-फ़िराक़ में
न किसी से मेरी दवा हुई न दवा से मुझ को शिफ़ा हुई
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Muztar Khairabadi
our suggestion based on Muztar Khairabadi
As you were reading Diversity Shayari Shayari