वो क़ज़ा के रंज में जान दें कि नमाज़ जिन की क़ज़ा हुई

तिरे मस्त-ए-बादा-ए-शौक़ ने न कभी पढ़ी न अदा हुई

तिरे दौर-दौरा-ए-इश्क़ में मिरी एक रंग से कट गई
न सितम हुआ न करम हुआ न जफ़ा हुई न वफ़ा हुई

मुझे ग़ैर-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़ ने तिरे दर पे जा के झुका दिया
न तो कोई अहद लिखा गया न तो कोई रस्म अदा हुई

मिरा दिल भी था मिरी जाँ भी थी न वही रहा न यही रही
मुझे क्या ख़बर कि वो क्या हुआ मुझे क्या ख़बर कि ये क्या हुई

मिरी उम्र 'मुज़्तर'-ए-ख़स्ता-दिल कटी रंज-ओ-दर्द-ओ-फ़िराक़ में
न किसी से मेरी दवा हुई न दवा से मुझ को शिफ़ा हुई

— Muztar Khairabadi

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