सर्द रात आवारगी ये आशियाँफ़र्श है सारी ज़मीं छत आसमाँतू मिरे ज़ेहन-ओ-जहाँ में हर घड़ीमैं तिरी दुनिया में आख़िर हूँ कहाँ— nakul kumar