
रहे जिस की ख़ुश्बू तमाम उम्र,तू तोहफ़तन वो गुलाब दे
नए रंग भर दिल-ओ-ज़ेहन में, मेरे यार मुझ को किताब दे
मैं शरीफ़-ओ-अहल-ए-जहाँ में 'अच्छों' की झूठी बातों से तंग हूँ
वो जो सामने मेरे सच कहे, मुझे दोस्त ऐसे ख़राब दे
— Nasreen Quamar
Shers of education.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling