कहानी बड़ी मुख़्तसर है
कोई सीप कोई गुहर है
बगूलों से उपजे बगूले
हवा तो फ़क़त नोंक भर है
फ़क़ीरों को दुनिया की परवा
अगरचे नहीं है, मगर है
ठहरते- ठहरते, ठहरते
ठहरना भी तो इक हुनर है
तुम्हारा कहा भी सुनेगी
अभी रूह परवाज़ पर है
कहो तो यहीं दिन तलाशें
यहाँ तीरगी पुरअसर है
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