Kafeel Aazar Amrohvi

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Kafeel Aazar Amrohvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kafeel Aazar Amrohvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कमरे में फैलता रहा सिगरेट का धुआँ मैं बंद खिड़कियों की तरफ़ देखता रहा — Kafeel Aazar Amrohvi

Ghazal

तुम से राह-ओ-रस्म बढ़ा कर दीवाने कहलाएँ क्यूँँ जिन गलियों में पत्थर बरसें उन गलियों में जाएँ क्यूँँ वैसे ही तारीक बहुत हैं लम्हे ग़म की रातों के फिर मेरे ख़्वाबों में यारो वो गेसू लहराएँ क्यूँँ मजबूरों की इस बस्ती में किस से पूछें कौन बताए अपना मोहल्ला भूल गई हैं बे-चारी लैलाएँ क्यूँँ मुस्तक़बिल से आस बहुत है मुस्तक़िल कैसा भी हो माज़ी किस के काम आया है माज़ी को दोहराएँ क्यूँँ हाँ हम ने भी आज किसी का नाज़ुक सा दिल तोड़ा है शहर-ए-वफ़ा की रस्म यही है हम इस पर शरमाएँ क्यूँँ खिड़की खिड़की सन्नाटा है चिलमन चिलमन तन्हाई चाहत की महफ़िल में अब हम नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ लाएँ क्यूँँ वादों के जंगल में 'आज़र' हम तो बरसों भटके हैं आप करें क्यूँँ दिल पे भरोसा आप ये धोका खाएँ क्यूँँ — Kafeel Aazar Amrohvi
तन्हाई की गली में हवाओं का शोर था आँखों में सो रहा था अँधेरा थका हुआ सीने में जैसे तीर सा पैवस्त हो गया था कितना दिल-ख़राश उदासी का क़हक़हा यूँँ भी हुआ कि शहर की सड़कों पे बार-हा हर शख़्स से मैं अपना पता पूछता फिरा बरसों से चल रहा है कोई मेरे साथ साथ है कौन शख़्स उस से मैं इक बार पूछता दिल में उतर के बुझ गई यादों की चाँदनी आँखों में इंतिज़ार का सूरज पिघल गया छोड़ी है उन की चाह तो अब लग रहा है यूँँ जैसे मैं इतने रोज़ अँधेरों में क़ैद था मैं ने ज़रा सी बात कही थी मज़ाक़ में तुम ने ज़रा सी बात को इतना बढ़ा लिया कमरे में फैलता रहा सिगरेट का धुआँ मैं बंद खिड़कियों की तरफ़ देखता रहा 'आज़र' ये किस की सम्त बढ़े जा रहे हैं लोग इस शहर में तो मेरे सिवा कोई भी न था — Kafeel Aazar Amrohvi
घटाओं की उदासी पी रहा हूँ मैं इक गहरा समुंदर बन गया हूँ तिरी यादों के अंगारों को अक्सर तसव्वुर के लबों से चूमता हूँ कोई पहचानने वाला नहीं है भरे बाज़ार में तन्हा खड़ा हूँ मिरा क़द कितना ऊँचा हो गया है फ़लक की वुसअतों को नापता हूँ वो यूँँ मुझ को भुलाना चाहते हैं कि जैसे मैं भी कोई हादिसा हूँ बदलते मौसमों की डाइरी से तिरे बारे में अक्सर पूछता हूँ मिरे कमरे में यादें सो रही हैं मैं सड़कों पर भटकता फिर रहा हूँ उभरते डूबते सूरज का मंज़र बसों की खिड़कियों से देखता हूँ किसी की याद के पत्तों को 'आज़र' हवाओं से बचा कर रख रहा हूँ — Kafeel Aazar Amrohvi
गुम-शुदा तन्हाइयों की राज़-दाँ अच्छी तो हो मैं यहाँ अच्छा नहीं हूँ तुम वहाँ अच्छी तो हो वक़्त-ए-रुख़्सत भीगे भीगे इन दरीचों की क़सम नूर-पैकर चाँद-सूरत गुलिस्ताँ अच्छी तो हो थरथराते काँपते होंटों को आया कुछ सुकूँ ऐ ज़बाँ रखते हुए भी बे-ज़बाँ अच्छी तो हो धूप ने जब आरज़ू के जिस्म को नहला दिया बन गई थीं तुम वफ़ा का साएबाँ अच्छी तो हो रात भर चिल्ले वज़ीफ़े वो तहज्जुद और फज्र मिल गया अब तो सिला ऐ मेरी माँ अच्छी तो हो इस ज़माने में जब अपनों का भरोसा हो फ़रेब सोचती रहती हो मैं जाऊँ कहाँ अच्छी तो हो झिलमिलाते हैं सितारे रात को पलकों पे जब चाँद से सुनती हो मेरी दास्ताँ अच्छी तो हो वो तुम्हारी इक सहेली बन गई थी जो दुल्हन उस से ख़त लिख कर कभी पूछा निहाँ अच्छी तो हो जब कहीं जाओ तो लिख देना मुझे अपना पता पूछने वर्ना मैं जाऊँगा कहाँ अच्छी तो हो तुम सदा अच्छी रहो 'आज़र' की है बस ये दुआ फ़ासले सदियों के हैं अब दरमियाँ अच्छी तो हो — Kafeel Aazar Amrohvi
कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं अश्क आँखों में मुसाफ़िर की तरह आते हैं क्यूँँ तिरे हिज्र के मंज़र पे सितम ढाते हैं ज़ख़्म भी देते हैं और ख़्वाब भी दिखलाते हैं हम भी इन बच्चों की मानिंद कोई पल जी लें एक सिक्का जो हथेली पे सजा लाते हैं ये तो हर रोज़ का मामूल है हैरान हो क्यूँँ प्यास ही पीते हैं हम भूक ही हम खाते हैं हर बड़ा बच्चों को जीने की दुआ देता है हम भी शायद इसी विर्से की सज़ा पाते हैं सुब्ह ले जाते हैं हम अपना जनाज़ा घर से शाम को फिर इसे काँधों पे उठा लाते हैं शहर की भीड़ में क्या हो इसी ख़ातिर 'आज़र' अपनी पहचान को हम घर में ही छोड़ आते हैं — Kafeel Aazar Amrohvi
सुकूँ थोड़ा सा पाया धूप के ठंडे मकानों में बहुत जलने लगा था जिस्म बर्फ़ीली चटानों में कब आओगे ये घर ने मुझ से चलते वक़्त पूछा था यही आवाज़ अब तक गूँजती है मेरे कानों में जनाज़ा मेरी तन्हाई का ले कर लोग जब निकले मैं ख़ुद शामिल था अपनी ज़िंदगी के नौहा-ख़्वानों में मिरी महरूमियाँ जब पत्थरों के शहर से गुज़रीं छुपाया सर तिरी यादों के टूटे साएबानों में मुझे मेरी अना के ख़ंजरों ने क़त्ल कर डाला बहाना ये भी इक बेचारगी का था बहानों में तमाशा हम भी अपनी बेबसी का देख लेते हैं तिरी यादों के फूलों को सजा कर फूलदानों में ज़मीं पैरों के छाले रोज़ चुन लेती है पलकों से तख़य्युल रोज़ ले उड़ता है मुझ को आसमानों में मैं अपने-आप से हर दम ख़फ़ा रहता हूँ यूँँ 'आज़र' पुरानी दुश्मनी हो जिस तरह दो ख़ानदानों में — Kafeel Aazar Amrohvi

Nazm

ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा ऐसे बद-बख़्त ज़माने में हज़ारों होंगे जिन को लोरी भी मुयस्सर नहीं आती होगी मेरी लोरी से तिरी भूक नहीं मिट सकती मैं ने माना कि तुझे भूक सताती होगी लेकिन ऐ मेरी उमीदों के हसीं ताज-महल मैं तिरी भूक को लोरी ही सुना सकती हूँ तेरा रह रह के ये रोना नहीं देखा जाता अब तुझे दूध नहीं ख़ून पिला सकती हूँ भूक तो तेरा मुक़द्दर है ग़रीबी की क़सम भूक की आग में जल जल के ये रोना कैसा तू तो आदी है इसी तरह से सो जाने का भूक की गोद में फिर आज न सोना कैसा आज की रात फ़क़त तू ही नहीं तेरी तरह और कितने हैं जिन्हें भूक लगी है बेटे रोटियाँ बंद हैं सरमाए के तह-ख़ानों में भूक इस मुल्क के खेतों में उगी है बेटे लोग कहते हैं कि इस मुल्क के ग़द्दारों ने सिर्फ़ महँगाई बढ़ाने को छुपाया है अनाज ऐसे नादार भी इस मुल्क में सो जाते हैं हल चलाए हैं जिन्हों ने नहीं पाया है अनाज तू ही इस मुल्क में नादार नहीं है सो जा ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा — Kafeel Aazar Amrohvi
हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे टाट का मैला फटा हुआ पर्दा तुम्हारे हाथ की जुम्बिश से काँप जाएगा कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे मुझे तो याद नहीं कुछ तुम्हारे सर की क़सम मगर पड़ोस की लड़की बता रही थी कि मैं अब अपनी माँग में अफ़्शाँ नहीं सजाती हूँ तवे पे रोटियाँ अक्सर जलाई हैं मैं ने शकर के बदले नमक चाय में मिलाती हूँ वो कह रही थी कि नंगी कलाइयाँ मेरी तमाम उम्र यूँँही चूड़ियों को तरसेंगी ग़मों की धूप में जलते हुए इस आँगन पर मसर्रतों की घटाएँ कभी न बरसेंगी वो कह रही थी कि तुम अब कभी न आओगे गली के मोड़ पे लेकिन हर एक शाम मुझे तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे — Kafeel Aazar Amrohvi
मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारी बाहें मेरी गर्दन में ब-सद-शौक़ हमाइल होंगी मुश्किलें राह-ए-मोहब्बत में न हाइल होंगी मैं ने सोचा था कि इस बार निगाहों के सलाम आएँगे और ब-अंदाज़-ए-दिगर आएँगे फूल ही फूल फ़ज़ाओं में बिखर जाएँगे मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारी साँसें मेरी बहकी हुई साँसों से लिपट जाएँगी बज़्म-ए-एहसास की तारीकियाँ छट जाएँगी मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारा पैकर मेरे बे-ख़्वाब दरीचों को सुला जाएगा मेरे कमरे को सलीक़े से सजा जाएगा मैं ने सोचा था कि इस बार मिरे आँगन में रंग बिखरेंगे उमीदों की धनक टूटेगी मेरी तन्हाई के आरिज़ पे शफ़क़ फूटेगी मैं ने सोचा था कि इस बार ब-ईं सूरत-ए-हाल मेरे दरवाज़े पे शहनाइयाँ सब देखेंगे जो कभी पहले नहीं देखा था अब देखेंगे मैं ने सोचा था कि इस बार मोहब्बत के लिए गुनगुनाते हुए जज़्बों की बरात आएगी मुद्दतों ब'अद तमन्नाओं की रात आएगी तुम मिरे इश्क़ की तक़दीर बनोगी इस बार जीत जाएगा मिरा जोश-ए-जुनूँ सोचा था और अब सोच रहा हूँ कि ये क्यूँँ सोचा था — Kafeel Aazar Amrohvi
अभी से उन के लिए इतनी बे-क़रार न हो किया है मुझ को बहुत बे-क़रार छेड़ा है तुम्हारे शे'र सुना कर तुम्हारे सर की क़सम सहेलियों ने मुझे बार बार छेड़ा है कशिश नहीं है तुम्हारे बिना बहारों में ये छत ये चाँद सितारे उदास लगते हैं चमन का रंग नसीम-ए-सहर गुलाब के फूल नहीं हो तुम तो ये सारे उदास लगते हैं ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने की मैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँ गई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगर जहान भर की उदासी समेट लाई हूँ कहीं पे गाए गए हैं जो गीत बाबुल के तो अजनबी से ख़यालों में खो गई हूँ मैं तुम्हारी याद के सीने पे बार-हा 'आज़र' तसव्वुरात का सर रख के सो गई हूँ मैं तुम्हें यक़ीन न होगा अकेले कमरे में मैं अपनी जान से प्यारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तमाम रात तुम्हें याद करती रहती हूँ तमाम रात तुम्हारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तुम आ भी जाओ कि गुज़रे हुए दिनों की तरह सुलग न जाएँ कहीं हसरतों की तस्वीरें उदास पा के न छेड़ें सहेलियाँ मुझ को बदल भी दो मिरी तन्हाइयों की तक़दीरें — Kafeel Aazar Amrohvi
कैसी ख़ामोशी है वीरानी है सन्नाटा है कोई आहट है न आवाज़ न कोई धड़कन दिल है या क़ब्र सुलगती हुई तन्हाई की ज़ेहन है या किसी बेवा का अकेला आँगन उड़ गया रंग हर इक सोच के आईने का शब के बे-नूर दुपट्टे से सितारे टूटे जम गई गर्द ख़यालों की हसीं राहों पर मुद्दतें हो गईं उम्मीद का दामन छूटे यक-ब-यक दूर बहुत दूर बहुत दूर कहीं तेरी पाज़ेब छनकने की सदा आने लगी शौक़ ने पाँव बढ़ाए उसी आवाज़ की सम्त तुझ से मिलने की लगन और भी तड़पाने लगी ये खंडर आज जहाँ रात की तारीकी में तू ने भूले हुए अफ़्साने को दोहराया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में कि जहाँ कितने दिन ब'अद तिरा साया नज़र आया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में हम ने उम्र भर साथ निभाने की क़सम खाई थी इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में तेरे थरथराते हुए होंटों पे दुआ आई थी रस्म कोई हो मगर हम को जुदा कर न सके ये रिवायात न पहनाएँ कभी ज़ंजीरें हम कि इस राज़ से इस बात से ना-वाक़िफ़ थे कि दु'आओं से बदलती ही नहीं तक़दीरें लेकिन अब रस्म कोई कुछ न कहेगी मुझ से अब रिवायात को मजबूर किया है मैं ने अब न रोकेगा मिरी राह ज़माना बढ़ कर जो भी अंजाम हो ये सोच लिया है मैं ने मैं मुक़द्दर से गले मिल के नहीं रो सकता तुझ को पाना मिरा मक़्सद है तुझे पाऊँगा आज ठुकरा के हर इक मस्लहत-अंदेशी को तेरे साए के तआक़ुब में चला जाऊँगा — Kafeel Aazar Amrohvi
कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत ये उदासी कब तलक कब तलक नज़्में लिखोगी रोओगी यूँँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक बाइबल में कब तलक ढूँडोगी ज़ख़्मों का इलाज मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए या हमेशा दर्द के शो'लों में जलना है तुम्हें कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी — Kafeel Aazar Amrohvi