tum se raah-o-rasm badha kar deewane kahlaayein kyun | तुम से राह-ओ-रस्म बढ़ा कर दीवाने कहलाएँ क्यूँँ

  - Kafeel Aazar Amrohvi

तुम से राह-ओ-रस्म बढ़ा कर दीवाने कहलाएँ क्यूँँ
जिन गलियों में पत्थर बरसें उन गलियों में जाएँ क्यूँँ

वैसे ही तारीक बहुत हैं लम्हे ग़म की रातों के
फिर मेरे ख़्वाबों में यारो वो गेसू लहराएँ क्यूँँ

मजबूरों की इस बस्ती में किस से पूछें कौन बताए
अपना मोहल्ला भूल गई हैं बे-चारी लैलाएँ क्यूँँ

मुस्तक़बिल से आस बहुत है मुस्तक़िल कैसा भी हो
माज़ी किस के काम आया है माज़ी को दोहराएँ क्यूँँ

हाँ हम ने भी आज किसी का नाज़ुक सा दिल तोड़ा है
शहर-ए-वफ़ा की रस्म यही है हम इस पर शरमाएँ क्यूँँ

खिड़की खिड़की सन्नाटा है चिलमन चिलमन तन्हाई
चाहत की महफ़िल में अब हम नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ लाएँ क्यूँँ

वादों के जंगल में 'आज़र' हम तो बरसों भटके हैं
आप करें क्यूँँ दिल पे भरोसा आप ये धोका खाएँ क्यूँँ

  - Kafeel Aazar Amrohvi

Udas Shayari

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