घटाओं की उदासी पी रहा हूँ

मैं इक गहरा समुंदर बन गया हूँ

तिरी यादों के अंगारों को अक्सर
तसव्वुर के लबों से चूमता हूँ

कोई पहचानने वाला नहीं है
भरे बाज़ार में तन्हा खड़ा हूँ

मिरा क़द कितना ऊँचा हो गया है
फ़लक की वुसअतों को नापता हूँ

वो यूँ मुझ को भुलाना चाहते हैं
कि जैसे मैं भी कोई हादिसा हूँ

बदलते मौसमों की डाइरी से
तिरे बारे में अक्सर पूछता हूँ

मिरे कमरे में यादें सो रही हैं
मैं सड़कों पर भटकता फिर रहा हूँ

उभरते डूबते सूरज का मंज़र
बसों की खिड़कियों से देखता हूँ

किसी की याद के पत्तों को 'आज़र'
हवाओं से बचा कर रख रहा हूँ

— Kafeel Aazar Amrohvi

More by Kafeel Aazar Amrohvi

Other ghazal from the same pen

See all from Kafeel Aazar Amrohvi →

Promise Shayari

Shers of promise.

All Promise Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling