koi manzil nahin milti to thehar jaate hain | कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं

  - Kafeel Aazar Amrohvi

कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं
अश्क आँखों में मुसाफ़िर की तरह आते हैं

क्यूँँ तिरे हिज्र के मंज़र पे सितम ढाते हैं
ज़ख़्म भी देते हैं और ख़्वाब भी दिखलाते हैं

हम भी इन बच्चों की मानिंद कोई पल जी लें
एक सिक्का जो हथेली पे सजा लाते हैं

ये तो हर रोज़ का मामूल है हैरान हो क्यूँँ
प्यास ही पीते हैं हम भूक ही हम खाते हैं

हर बड़ा बच्चों को जीने की दुआ देता है
हम भी शायद इसी विर्से की सज़ा पाते हैं

सुब्ह ले जाते हैं हम अपना जनाज़ा घर से
शाम को फिर इसे काँधों पे उठा लाते हैं

शहर की भीड़ में क्या हो इसी ख़ातिर 'आज़र'
अपनी पहचान को हम घर में ही छोड़ आते हैं

  - Kafeel Aazar Amrohvi

Sazaa Shayari

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