shaam bhi ho gai dhundla gai aankhen bhi meri | शाम भी हो गई धुँदला गई आँखें भी मिरी

  - Parveen Shakir

शाम भी हो गई धुँदला गई आँखें भी मिरी
भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ

  - Parveen Shakir

Shaam Shayari

Our suggestion based on your choice

    मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है
    तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूबसूरत है

    बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम
    मुझे पता चला वो कितनी ख़ूबसूरत है
    Read Full
    Bashir Badr
    75 Likes
    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
    Bashir Badr
    110 Likes
    देख कर इंसान की बेचारगी
    शाम से पहले परिंदे सो गए
    Iffat Zarrin
    24 Likes
    ये शाम ख़ुशबू पहन के तेरी ढली है मुझमें जो रेज़ा रेज़ा
    मैं क़तरा क़तरा पिघल रही हूँ ख़मोश शब के समन्दरों में
    Kiran K
    कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
    तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से
    Farhat Abbas Shah
    37 Likes
    था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली
    न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ
    Aanis Moin
    23 Likes
    अभी तो शाम की दस्तक हुई है
    अभी से लग गया बिस्तर हमारा

    यही तन्हाई है जन्नत हमारी
    इसी जन्नत में है अब घर हमारा
    Read Full
    Vikas Sharma Raaz
    35 Likes
    सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है
    शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है

    वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो
    वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
    Read Full
    Nadeem Farrukh
    60 Likes
    तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई
    वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई
    Faiz Ludhianvi
    69 Likes
    शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
    दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं
    Firaq Gorakhpuri
    39 Likes

More by Parveen Shakir

As you were reading Shayari by Parveen Shakir

    वो हम नहीं जिन्हें सहना ये जब्र आ जाता
    तिरी जुदाई में किस तरह सब्र आ जाता

    फ़सीलें तोड़ न देते जो अब के अहल-ए-क़फ़स
    तू और तरह का एलान-ए-जब्र आ जाता

    वो फ़ासला था दुआ और मुस्तजाबी में
    कि धूप माँगने जाते तो अब्र आ जाता

    वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया
    बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता

    वज़ीर ओ शाह भी ख़स-ख़ानों से निकल आते
    अगर गुमान में अँगार-ए-क़ब्र आ जाता
    Read Full
    Parveen Shakir
    मुश्किल है कि अब शहर में निकले कोई घर से
    दस्तार पे बात आ गई होती हुई सर से

    बरसा भी तो किस दश्त के बे-फ़ैज़ बदन पर
    इक उम्र मिरे खेत थे जिस अब्र को तरसे

    कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है
    चिड़ियों को बड़ा प्यार था उस बूढ़े शजर से

    मेहनत मिरी आंधी से तो मंसूब नहीं थी
    रहना था कोई रब्त शजर का भी समर से

    ख़ुद अपने से मिलने का तो यारा न था मुझ में
    मैं भीड़ में गुम हो गई तन्हाई के डर से

    बे-नाम मसाफ़त ही मुक़द्दर है तो क्या ग़म
    मंज़िल का तअय्युन कभी होता है सफ़र से

    पथराया है दिल यूं कि कोई इस्म पढ़ा जाए
    ये शहर निकलता नहीं जादू के असर से

    निकले हैं तो रस्ते में कहीं शाम भी होगी
    सूरज भी मगर आएगा इस रहगुज़र से
    Read Full
    Parveen Shakir
    वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
    मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
    Parveen Shakir
    62 Likes
    तराश कर मेरे बाज़ू उड़ान छोड़ गया
    हवा के पास बरहना कमान छोड़ गया

    रफ़ाक़तों का मेरी उस को ध्यान कितना था
    ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया

    अजीब शख़्स था बारिश का रंग देख के भी
    खुले दरीचे पे इक फूल-दान छोड़ गया

    जो बादलों से भी मुझ को छुपाए रखता था
    बढ़ी है धूप तो बे-साएबान छोड़ गया

    निकल गया कहीं अन-देखे पानियों की तरफ़
    ज़मीं के नाम खुला बादबान छोड़ गया

    उक़ाब को थी ग़रज़ फ़ाख़्ता पकड़ने से
    जो गिर गई तो यूँही नीम-जान छोड़ गया

    न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है
    कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया

    अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल
    किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया
    Read Full
    Parveen Shakir
    अश्क आँख में फिर अटक रहा है
    कंकर सा कोई खटक रहा है

    मैं उस के ख़याल से गुरेज़ाँ
    वो मेरी सदा झटक रहा है

    तहरीर उसी की है मगर दिल
    ख़त पढ़ते हुए अटक रहा है

    हैं फ़ोन पे किस के साथ बातें
    और ज़ेहन कहाँ भटक रहा है

    सदियों से सफ़र में है समुंदर
    साहिल पे थकन टपक रहा है

    इक चाँद सलीब-ए-शाख़-ए-गुल पर
    बाली की तरह लटक रहा है
    Read Full
    Parveen Shakir

Similar Writers

our suggestion based on Parveen Shakir

Similar Moods

As you were reading Shaam Shayari Shayari