sukoon thoda sa paaya dhoop ke thande makaanon men | सुकूँ थोड़ा सा पाया धूप के ठंडे मकानों में

  - Kafeel Aazar Amrohvi

सुकूँ थोड़ा सा पाया धूप के ठंडे मकानों में
बहुत जलने लगा था जिस्म बर्फ़ीली चटानों में

कब आओगे ये घर ने मुझ से चलते वक़्त पूछा था
यही आवाज़ अब तक गूँजती है मेरे कानों में

जनाज़ा मेरी तन्हाई का ले कर लोग जब निकले
मैं ख़ुद शामिल था अपनी ज़िंदगी के नौहा-ख़्वानों में

मिरी महरूमियाँ जब पत्थरों के शहरस गुज़रीं
छुपाया सर तिरी यादों के टूटे साएबानों में

मुझे मेरी अना के ख़ंजरों ने क़त्ल कर डाला
बहाना ये भी इक बेचारगी का था बहानों में

तमाशा हम भी अपनी बेबसी का देख लेते हैं
तिरी यादों के फूलों को सजा कर फूलदानों में

ज़मीं पैरों के छाले रोज़ चुन लेती है पलकों से
तख़य्युल रोज़ ले उड़ता है मुझ को आसमानों में

मैं अपने-आप से हर दम ख़फ़ा रहता हूँ यूँँ 'आज़र'
पुरानी दुश्मनी हो जिस तरह दो ख़ानदानों में

  - Kafeel Aazar Amrohvi

Qatil Shayari

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