raat ke dasht men faila hua sannaata hooñ | रात के दश्त में फैला हुआ सन्नाटा हूँ

  - Kafeel Aazar Amrohvi

रात के दश्त में फैला हुआ सन्नाटा हूँ
अपने साए से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ

मैं कभी अपने लिए ग़ैर नहीं था इतना
आईना देख के कल रात बहुत रोया हूँ

तुम से मिलने की ख़ुशी है न बिछड़ने का मलाल
ख़ुद-फ़रेबी के अब इस मोड़ पे आ पहुँचा हूँ

जब से इक ख़्वाब की ता'बीर मिली है मुझ को
मैं हर इक ख़्वाब की ता'बीर से घबराता हूँ

कोई मिलता ही नहीं आँख मिलाने वाला
मैं तिरे शहर में सूरज की तरह तन्हा हूँ

ज़िंदगी का कोई मक़्सद ही नहीं है 'आज़र'
और मैं हूँ कि ज़रूरत की तरह ज़िंदा हूँ

  - Kafeel Aazar Amrohvi

Irada Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Kafeel Aazar Amrohvi

As you were reading Shayari by Kafeel Aazar Amrohvi

Similar Writers

our suggestion based on Kafeel Aazar Amrohvi

Similar Moods

As you were reading Irada Shayari Shayari