क्या इल्म उन्होंने सीख लिया जो बिन लिक्खे को बाँचे हैं

और बात नहीं निकले मुँह से बिन होठ हिलाए जाँचे हैं
दिल उन के तार सितारों के तन उन के तबल तमाचे हैं
मुँहचंग ज़बाँ दिल सारंगी या घुँघरू हाथ कमाचे हैं
है राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के साँचे हैं
जो बेगत बे-सुर ताल हुए बिन ताल पखावज नाचे हैं
कुल बाजे बजकर टूट गए आवाज लगी जब भर्राने
और छम छम घुँघरू बंद हुए तब गत का अंत लगे पाने
संगीत नहीं ये संगत है संतों का जिस से जी माने
ये नाच कोई क्या पहिचाने इस नाच को नाचे सो जाने
जब हाथ को धोया हाथों से और हाथ लगे फड़काने को
और पाँवों को खींचा पावों से तब पाँव लगे गत पाने को
जब आँख उठाली हँसने से और नैन लगे मटकाने को
सब काछ कछे सब नाच नचे उस रसिया छैल रिझाने को

जो आग जिगर में भड़की है उस शो'ले की उजियाली है
जो मुँह पर हुस्न की जर्दी है उस जर्दी की सब लाली है
जिस गत पर उन का पाँव पड़ा उस गत की चाल निराली है
जिस मज्लिस में वो नाचे हैं वो मज्लिस सब से ख़ाली है
सब घटता बढ़ता फेंक उधर और ध्यान इधर धर भरते हैं
बिन तारों तार मिलाते हैं जब नृत्य निराला करते हैं
बिन गहने झमक दिखाते हैं बिन जूड़े मन को हरते हैं
बिन हाथों भाव बताते हैं बिन पाँव खड़े गत भरते हैं

था जिन की ख़ातिर नाच बना तब सूरत उन की आई गई
कहीं आप हुए कहीं नाच हुआ और तान कहीं भर्राई गई
अब छैल छबीले सुंदर की छबि नैन के अंदर छाई गई
एक सूरत लाल त्रिभंगी की और जोति में जोति समाय गई
सब होश बदन का दूर हुआ जब गत पर आ मृदंग बजे
तन भंग हुआ दिल भंग हुआ सब आन गई बे आन सजे
ये नाचा कौन ‘नज़ीर’ और यां किस लिए रचाया नाच अज़ी
जब बूँद ही जा दरियाव पड़ी उस तान का आख़िर निकला जी
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं

— Nazeer Akbarabadi

More by Nazeer Akbarabadi

Other nazm from the same pen

See all from Nazeer Akbarabadi →

Education Shayari

Shers of education.

All Education Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling