एक राही अजनबी की रहनुमाई की तरफ़
चल पड़ा था इश्क़ में मैं इंतिहाई की तरफ़
आज कल पर टालते थे इस
में हम भी क्या करें
खींचता था कोइ हमको चारपाई की तरफ़
मुश्किलों से पार करता हूँ नदी ये शब को मैं
सुब्ह ले आती है फिर से इब्तिदाई की तरफ़
तीरगी के बीच में लेकर शमआ को हाथ में
रात भर चलता रहा मैं रौशनाई की तरफ़
आरज़ू ये है मेरी, माथा वो मेरा चूम कर
ग़ौर भी चाहे न करना जग-हँसाई की तरफ़
बद-नसीबी और बहाने हैं ही दिल बहलाने को
रात है ही रौशनी की आज़माई की तरफ़
तैर सकता था किसी मैं कंपटीशन में मगर
बेबसी ले आई मुझ को ना ख़ुदाई की तरफ़
ना-उम्मीदी इस क़दर घर कर गई सीने में फिर
मर गया वो देखता रक्खी दवाई की तरफ़
मैं तो सोज़ो साज़ में उसके तराने गाता हूँ
वो भी मेरी तरह हो इस हमनवाई की तरफ़
जो पुराना हो गया मातम का गाना हो गया
ग़ौर करता है कहाँ कोई भी काई की तरफ़
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