मिरे साथ वो जो घड़ी - भर रहा था

सुना है किसी का सितमगर रहा था।

उसी की ख़बर छप रही थी नगर में
सनम है कभी जो सुख़न-वर रहा था।

लरज़ते हुए हाथ थमते नहीं थे
वो बूढ़ा सिने में धुआँ भर रहा था।

मैं वो दास्ताँ भूल पाता नहीं हूँ
मैं चौखट पे था और वो अंदर रहा था।

पिघल जा रहे थे सभी ख़्वाब मेरे
रफ़ीकों सुनो वो कलंदर रहा था।

मैं उस के जमाने का शाइ'र नहीं हूँ
कुचल के क़दर जो मुक़र्रर रहा था।

— Nilesh Barai

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