ज़ख़्मों पे अब गुलाब दो
थोड़ा हमें हिसाब दो
वीरान दिल के शहर में
यादों की इक किताब दो
सूखी हुई है शाख़-ए-दिल
बरसात की शबाब दो
ठहरी हुई हैं बेड़ियाँ
आज़ाद कोई ख़्वाब दो
— Nit
थोड़ा हमें हिसाब दो
वीरान दिल के शहर में
यादों की इक किताब दो
सूखी हुई है शाख़-ए-दिल
बरसात की शबाब दो
ठहरी हुई हैं बेड़ियाँ
आज़ाद कोई ख़्वाब दो
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