us ne jab ban-sanwar ke dastak dii | उस ने जब बन-सँवर के दस्तक दी

  - Nitesh Kushwah

उस ने जब बन-सँवर के दस्तक दी
यूँँ लगा सीधे दिल पे दस्तक दी

दौड़ कर खोलते थे दरवाज़ा
सोचते थे कि तू ने दस्तक दी

उस ने खिड़की से भी नहीं झाँका
'उम्र भर जिस के दर पे दस्तक दी

रात पथराई भीगी आँखों में
ख़्वाब के क़ाफ़िले ने दस्तक दी

मैं ने दरवाज़ा ही नहीं खोला
रात फिर ख़ुद-कुशी ने दस्तक दी

ज़िंदगी कर गई ग़ज़ल पूरी
मौत के क़ाफ़िए ने दस्तक दी

  - Nitesh Kushwah

Dil Shayari

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