उस ने जब बन-सँवर के दस्तक दी यूँ लगा सीधे दिल पे दस्तक दीदौड़ कर खोलते थे दरवाज़ासोचते थे कि तू ने दस्तक दीउस ने खिड़की से भी नहीं झाँकाउम्र भर जिस के दर पे दस्तक दीरात पथराई भीगी आँखों मेंख़्वाब के क़ाफ़िले ने दस्तक दीमैं ने दरवाज़ा ही नहीं खोलारात फिर ख़ुद-कुशी ने दस्तक दीज़िंदगी कर गई ग़ज़ल पूरीमौत के क़ाफ़िए ने दस्तक दी— Nitesh Kushwah