हाँ यही सच है कि दिल मैं ने लगाया था कभी
आस्तीं में इक सँपोले को बसाया था कभी
वो जो रो रो के दिखाता है दिली ज़ख़्मों को अब
मैं ने उस से भी कई ज़ख़्मों को पाया था कभी
उस की गाली पे मुझे ग़म भी भला क्यूँ कर हो यूँ
उस ने इन क़दमों में सर भी तो झुकाया था कभी
टीस होती है उसे होने दो मुझ को क्या पड़ा
दर्द से मैं ने भी दिल अपना दबाया था कभी
जंग है उपमन्यु की जारी मगर ये ख़ुदस है
मुझ ज़ियाले को वो यूँ ज़िद पर जो लाया था कभी
— Nityanand Vajpayee















