हम सुख़न-संज हैं लहजा नहीं बदला करते
डर से घबरा के यूँ रस्ता नहीं बदला करते
तुम को ये ताज मुबारक हो सियासत वालों
हम किसी हाल में जत्था नहीं बदला करते
अपने मतलब के लिए छोड़ के सच का पल्लू
आलम-ए-हिरमाँ में नारा नहीं बदला करते
सिर्फ़ मज़हब की सियासत से जलाकर बस्ती
अम्न-ओ-आश्ती से ख़राबा नहीं बदला करते
जिस
में 'उपमन्यु' खिलाए हों सुकूँ के गुलशन
ख़ौफ़-ओ-दहशत में वो ख़ित्ता नहीं बदला करते
— Nityanand Vajpayee















