ghazab maasoomiyat chehre se vo chhalaka gaya tha kya | ग़ज़ब मासूमियत चेहरे से वो छलका गया था क्या

  - Nityanand Vajpayee

ग़ज़ब मासूमियत चेहरे से वो छलका गया था क्या
लबों की सुर्ख़ पंखुड़ियों से रस बरसा गया था क्या

तुम अब तक कसमसाते से हो यूँँ जैसे के लजवन्ती
कोई नज़रों से कमसिन जिस्म को सहला गया था क्या

यूँँ ज़िद करते हुए से तुम अचानक मुस्कुराई क्यूँ
तुम्हें तस्वीर दिलवर की कोई दिखला गया था क्या

कि इस युग में तुम्हें उस सा कहीं हमदम नहीं मिलना
भविष्यत-वाक़या पहले कोई बतला गया था क्या

तड़प मिलने की थी पर अब बिछड़ने की क़वायद है
सर-ए-फ़ितना कोई आकर तुम्हें फुसला गया था क्या

अज़ब तूफ़ान-ए-उल्फ़त था मगर अब यूँँ अदावत है
के दौर-ए-पुर-फ़ितन ऐसा कोई बरपा गया था क्या

मुक़द्दर में तुम्हारे मैं मेरे में बस तुम्हीं तुम थे
तो फिर झूठा कोई तुमको यूँँ ही बहका गया था क्या

  - Nityanand Vajpayee

DP Shayari

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