जीत उसकी हो हर इक बार ज़रूरी तो नहीं
यूँँ ही' सजता रहे दरबार ज़रूरी तो नहीं
झूठ उसका न अभी खुलके है आगे आया
यूँँ ही बचता रहे मक्कार ज़रूरी तो नहीं
नेकियाँ और बची कुछ जो उन्हें जी ले तू
कल भी होगी तेरी जयकार ज़रूरी तो नहीं
उसके कर्मों की सज़ा देगी उसे क़ुदरत ख़ुद
मैं बनूँ उसका गुनहगार ज़रूरी तो नहीं
ख़ून हर बार ही मासूम बहाएँ अपना
और पलता रहे ग़द्दार ज़रूरी तो नहीं
'नित्य' इक रोज़ कहीं मौत तो आएगी उसे
यूँँ ही बढ़ती रहे रफ़्तार ज़रूरी तो नहीं
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