दयार-ए-इश्क़ में बस दर्द और आहें मिलींदवाएँ बाँट रहीं शाइरीन गाहें मिलींबका का जिंस-ए-बशर के जिगर में डेरा थाहमें भी तब तो फ़क़त शा'इरी की बाहें मिलीं— Nityanand Vajpayee