थे सब के हाथ में ख़ंजर सवाल क्या करता

मैं बे-गुनाही का अपनी मलाल क्या करता

उसी के एक इशारे पे क़त्ल-ए-आम हुआ
अमीर-ए-शहरस मैं अर्ज़-ए-हाल किया करता

मैं क़ातिलों की निगाहों से बच के भाग आया
कि मेरे साथ थे मेरे अयाल क्या करता

धरम के नाम पर इंसानियत की नस्ल-कुशी
ज़माना ऐसी भी क़ाएम मिसाल क्या करता

जले मकान जले जिस्म जल-बुझा सब कुछ
वो इस से बढ़ के हमें पाएमाल क्या करता

बटे हुए हैं हमी अपने अपने ख़ानों में
हमारा वर्ना कोई ऐसा हाल क्या करता

— Noor muniri

Mazhab Shayari

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