खेल अबकी बार आर-पार चाहिए
और एक दिल मुझे उधार चाहिए
आरज़ू तिरी है पर तिरी ही ज़िद नहीं
फिर तू क्यूँ मुझे ही बार बार चाहिए
जानता हूँ सच है क्या या क्या ये झूठ है
फ़ैसले को तुझ सा राज़दार चाहिए
मैं निकल चलूँगा इक सियाह रात में
साथ कोई तुझ सा ताबदार चाहिए
बैठा मेरे साथ हैं तो मुझ से बात कर
मुझ को कोई मुझ सा ग़म-गुसार चाहिए
यार तेरे शहर में मैं आ तो जाऊँ पर
मिलने को तो तेरा इख़्तियार चाहिए
— Paras Angral















