पास होना उस का काफ़ी होता है
यूँही तो बस जीना काफ़ी होता है
हो महल गर तो भी कम पड़ जाता है
रहने को इक कमरा काफ़ी होता है
ये ज़रूरी तो नहीं हासिल भी हो
चाँद का बस दिखना काफ़ी होता है
हँसने को तो दुनिया कम पड़ जाती है
रोने को इक कंधा काफ़ी होता है
ग़ैरों पर पारस यक़ीं हो जाता है
धोखे को इक अपना काफ़ी होता है
— Paras Angral















