साथ बचपन से हुए जो बड़े हैं
यार हैं दो जो अभी भी खड़े हैं
कर ली है ख़ामोशी ही मंज़ूर अब
सौ दफ़ा इश्क़ में ख़ुद से लड़े हैं
तुम जो अब खोज रहे हो बाहर
हम कहीं अपने ही अंदर पड़े हैं
देखना ग़ैरों की ओर अब 'पारस'
तीर अपने यहाँ ता'ने खड़े हैं
— Paras Angral















