तुझे भूल जाने से डर लगता है
तिरे पास आने से डर लगता है
तुझे आज़माने से डर लगता है
वो झूठे फ़साने से डर लगता है
नहीं खोया मैं ने अभी तक है जो
उसी को ही पाने से डर लगता है
तिरा नाम जिस
में है मैं ने लिया
ग़ज़ल वो सुनाने से डर लगता है
ये सब शहर से मैं उलझ लूँ मगर
तिरे वो फ़लाने से डर लगता है
तुझे भूल जाऊँ ये मुमकिन है पर
तिरे ख़त जलाने से डर लगता है
इसे दफ़्न रहने दो 'पारस' यहीं
वो गुज़रे ज़माने से डर लगता है
— Paras Angral















