मैं तुम्हें ही जानता हूँ
कुछ न गर मैं मानता हूँ
लाख चेहरों में वो इक को
दूर से पहचानता हूँ
और तो कोई नहीं पर
माँ तुझे रब मानता हूँ
जो हक़ीक़त में नहीं है
ख़्वाब में वो जानता हूँ
नाम बेशक लूँ न उस का
ख़ूनी को पहचानता हूँ
सच उसे 'पारस' कहूँगा
दिल में तो ये ठानता हूँ
— Paras Angral















