“काश“
गहरी रात
दूर तक रौशनाई नहीं
कोई मुसाफ़िर भी नहीं
हवाएँ ऐसी जैसे
जिस्म पर
ओले पड़ रहे हों
काश कि ये
सर्द हवाएँ
बचा लेती मुझे
जीने से
काश कि सच में
ठंडा पड़ जाता
मेरा जिस्म
— Piyush Nishchal
गहरी रात
दूर तक रौशनाई नहीं
कोई मुसाफ़िर भी नहीं
हवाएँ ऐसी जैसे
जिस्म पर
ओले पड़ रहे हों
काश कि ये
सर्द हवाएँ
बचा लेती मुझे
जीने से
काश कि सच में
ठंडा पड़ जाता
मेरा जिस्म
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