एक आहट

तन्हाई को बाहों में लिए
सो रहा था मैं
किसी ने यादों का दिया जला
मुझ को जगा दिया
वो तुम ही थीं क्या

सोचा कि उस दिए को
देख के ही रात गुज़ार लूँ
किसी ने चूम कर माथे को
फिर से मुझे सुला दिया
वो तुम ही थीं क्या

सूरज की किरणों को
जब तरस न आया मेरी उजड़ी नींदों पे
किसी ने अपनी ज़ुल्फ़ों का
चादर मुझ पे बिछा दिया
वो तुम ही थीं क्या

खुली जब आँखें मेरी
तलाश थी उन्हें एक चेहरे की
किसी ने अपने रुख़ को
मुझ से दूर कहीं छुपा दिया
वो तुम ही थीं क्या

ढूँढा तो बहुत मैं ने
कोई निशाँ अपने मकान में
किसी ने अपने आने के
हर निशान को ही मिटा दिया
वो तुम ही थीं क्या

— Prakash Pandey

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