गुनाह

हाँ ये सच है कि मैं ने देर कर दी
क्या देर करना कोई गुनाह है

मैं थक गया था और गिर गया था
किन-किन दरों पे मैं फिर गया था

थे दिन अधूरे और रातें ख़ाली
था मुफ़लिसी में थे हाथ भी ख़ाली

क्या मुफ़लिसी भी कोई गुनाह है
क्या देर करना कोई गुनाह है

मैं वीरानियों में खो गया था
और एक जहाँ का हो गया था

मैं एक शजर था जहाँ पे मैं था
उन बादलों की ही पनाह में था

फिर बादलों का भी साथ छूटा
क्या साथ छूटा या बाँध टूटा

कल शजर था अब रेत में था
मैं उस दरिया की चपेट में था

कोई बहा दे तो क्या पनाह है
क्या देर करना कोई गुनाह है

सुनी नहीं मेरी आह फिर से
मैं हो गया था तबाह फिर से

जहाँ पर था वही रहा था मैं
मगर जो था अब नहीं रहा मैं

मैं एक फूल की फ़िराक में था
उन तितलियों की ताक में था

जो फूल था वो अब खिला है
रास्ता लौटने का अब मिला है

अब लौटता हूँ तो देर होगी
क्या उस देर को तुम सँभाल लोगी

तुम ही बताओ क्या सलाह है
क्या देर करना कोई गुनाह है

— Praveen Bhardwaj

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