पुराने घर के कोने में ख़ज़ाना ढूँढ़ते होंगे
पुराने लोग हैं अपना ज़माना ढूँढ़ते होंगे
ग़ज़ल कहने लगा हूँ जब से मैं ग़ैरों की महफ़िल में
मिरे सब यार अब मेरा ठिकाना ढूँढ़ते होंगे
कुँवारे उस की ख़ातिर ज़िंदगी में रह भी लें तो क्या
पिता उस के कोई लड़का सयाना ढूँढ़ते होंगे
वफ़ा कल रात दस्तक दे रही थी मेरी चौखट पे
जफ़ा के तीर भी अपना निशाना ढूँढ़ते होंगे
मुहब्बत से मैं ज़िंदा बच गया मालूम है उन को
यक़ीनन आशिक़ अब मेरा ठिकाना ढूँढ़ते होंगे
— Pravendra Anuragi















