तुम यक़ीं करते नहीं भूलने भुलाने में
किस तरह तुम जी रहे हो नए ज़माने में
हर भरोसे का जज़ीरा फिसल गया इक दिन
हाथ शामिल थे मिरे ही मुझे डुबाने में
ये बिछड़ते हुए चेहरे हमें बताते हैं
वक़्त लगता है बहुत ख़्वाब इक सजाने में
ये नया दोस्त मेरी जीत की वजह है अभी
हो न जाए कहीं शामिल मुझे हराने में
दिल दुखाने को घड़ी भर की बात काफ़ी है
उम्र लगती है मियाँ दिल से मुस्कुराने में
इन हवाओं से कभी दुश्मनी नहीं रक्खी
सो दिये जलते थे हर शाम आशियाने में
इस तरह से उसे हर रोज़ ढूँढ़ता हूँ मैं
जैसे वो आख़िरी ही हर्फ़ हो तराने में
— Pravendra Anuragi















