रोज़ जीने की मैं ज़हमत उठाता हूँएक रिश्ता जो ख़ुद से ख़ुद निभाता हूँआता नइँ कोई इस घर में मगर फिर भीरोज़ दरवाज़े से दीमक हटाता हूँ— Rajat Bhardwaj